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गुरुवार, दिसंबर 09, 2010

पावन मिथिला महान


 मधुबनी क्षेत्र में मंदिरों, प्राचीन मूर्तियों व पौराणिक अवशेषों की भरमार है। यहां शैव, शाक्त, वैष्णव व बौद्ध मतालंबियों से संबंधित स्थलों की तादाद कम नहीं। पाल, सेन एवं कर्नाट वंशीय शासकों द्वारा निर्मित मंदिर व उसमें स्थापित देव विग्रह अतुलनीय है। जिले कई गढ़ों के पुरावशेष आज भी विद्यमान हैं। लेकिन अभी तक इन धरोहरों को संरक्षित कर पर्यटक स्थल के रूप में विकसित नहीं किए जाने से पर्यटन की अपार संभावनाओं को बल नहीं मिल सका है। यदि जिले के कुछ महत्वपूर्ण स्थलों का ही अगर विकास पर्यटक स्थल के रूप में कर दिया जाए तो ढेरों विदेशी मुद्राओं के आय के साथ इस क्षेत्र में रोजगार के बेहतर साधन उपलब्ध हो सकता है।
जिला मुख्यालय स्थित भौआड़ा गढ़ शुभंकर ठाकुर के राजस्व काल (1581-95) में निर्मित हुआ। उसके बाद महाराजाधिराज सर रमेश्वर सिंह (1898-1929) के शासनकाल में अनेक मंदिरों का निर्माण हुआ। जिसमें भौआड़ा गढ़ स्थित भव्य काली मंदिर है। इतिहासविज्ञ डॉ. नरेन्द्र नारायण सिंह निराला इसे मिथिला का सबसे ऊंचा मंदिर बताते हैं। यह काली मंदिर दर्शनीय व रमणीय है को पर्यटक स्थल के रूप में विकसित करना जरूरी है। वहीं नगर के गंगासागर तालाब के पश्चिम भिण्डे पर स्थापित काली मंदिर भी दर्शनीय है। जिले के बेनीपट्टी अनुमंडल मुख्यालय से पांच किमी पश्चिम प्रसिद्ध सिद्धपीठ उच्चैठ दुर्गा स्थल जो महाकवि कालीदास से संबंद्ध है को घोषणा के बावजूद पर्यटक स्थल के रूप में विकसित नहीं किया जा सका है। जबकि इसके लिए समविकास योजना से राशि उपलब्ध करा दी गई है। मधुबनी मुख्यालय से आठ किमी उत्तर अति प्राचीन राज-राजेश्वरी स्थान जहां शिव-पार्वती की प्राचीन युग्म प्रतिमा स्थापित है को पर्यटक स्थल के रूप में विकसित किया जा सकता है। वहीं पंडौल प्रखंड से पांच किमी पूरब महाकवि विद्यापति से संबंधित उगनेश्वर शिवालय, सौराठ सभागाछी व वहां के माधवेश्वर नाथ व सोमनाथ शिवालय, हरलाखी प्रखंड स्थित माता जानकी से संबंद्ध गिरिजा स्थान, विशौल स्थित विश्वामित्र आश्रम, कल्याणेश्वर शिवालय, रहिका प्रखंड मुख्यालय से चार किमी दक्षिण कपिलमुनि द्वारा प्रसिद्ध कपिलेश्वर स्थान, रहिका स्थित उर्वशी नाथ, रहिकेश्वरी भगवती, कभी तंत्र विद्या के लिए प्रसिद्ध रहे मुख्यालय से सटा मंगरौनी गांव स्थित बूढ़ी माई व एकादश रुद्र मंदिर, कोइलख की भद्रकाली भगवती, नाहर भगवती पुर स्थित सूर्य, विष्णु व दुर्गा सहित अन्य प्रतिमाएं, सूर्य मूर्ति (बरुआर, परसा, रखवारी, अंधराठाढी, भीठ भगवानपुर व अकौर) विष्णु मूर्ति (अकौर, भीठ भगवानुपर, कमलादित्य स्थान) कार्तिकेय (बसुआरा), भैरव (बलिया), अयाची मिश्र द्वारा सरिसवपाही स्थित सिद्धेश्वरी भगवती, महाकवि विद्यापति डीह बिस्फी व उनके द्वारा स्थापित भगवती विश्वेश्वरी, याज्ञवल्क्य आश्रम, उत्तरा स्थित दक्षेश्वर शिव, गांडीवेश्वर शिवधाम (शिवनगर), भोज पंडौल की देव प्रतिमाएं, बराह मंदिर सलेमपुर, जयनगर स्थित शिलानाथ, पंचानन महादेव (अरघावा व ब्रह्मापुर),विदेश्वर शिवालय लोहना, मदनेश्वर शिवालय, जागेश्वर शिवालय, पारसमणी शिवालय रहुआ संग्राम, शेषशायी विष्णु बलिया, कपिलेश्वर काली, शिव व ब्रह्मा, मैवी शांति नाथ, पंचानाथ शिवालय झंझारपुर, अंकुशी शिव लखनौर, लक्ष्मीनाथ गोसाई कुटी (लखनौर), तीन काल को समेटे बलिराजगढ़, अंधराठाढ़ी के पस्टन स्थित बौद्ध बिहार का खंडहर ऐसी प्राचीन स्थल जिनका पर्यटन स्थल के रूप में विकास कर पर्यटन के नक्शे पर लाना अब जरूरी हो गया है। अंधराठाढ़ी के नवनगर गांव में एक प्राचीन शिवालय जमींदोज होने की स्थिति में हैं। ऐसे में मधेपुर प्रखंड के कोसी के गर्भ में द्वालख गांव में प्राचीन हरेश्वर नाथ शिवालय भी गिरने की स्थिति में है। लेकिन इसे देखने वाला कोई नहीं है। वर्तमान ग्रामीण विकास मंत्री नीतीश मिश्र के प्रयास से परसा सूर्य मंदिर, कमलादित्य स्थान, हरेश्वर नाथ शिवालय, नवनगर शिवालय आदि का संरक्षण व संब‌र्द्धन कर पर्यटक स्थल के रूप में विकसित करने के लिए कला व संस्कृति विभाग ने इन स्थलों पर प्रतिवेदन मंगवाया था। लेकिन वे फाइलें कहां हैं पता नहीं।
यदि मधुबनी के इन स्थलों का सरकार संरक्षण व संव‌र्द्धन कर पर्यटक स्थल के रूप में विकसित कर दे तो देसी-विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करने से सफलता मिल सकती है और इससे ढेरों राजस्व प्राप्त करने के साथ-साथ यहां के लोगों को रोजगार भी। मेरा आग्रह है की भारत सरकार एवं बिहार सरकार मुख्या रूप से इस  विषय पर ध्यान दे . ताकि सारे संसार को  मिथिला  की संस्कृति को समझने का अवसर पर्दान हो . इस के लिए मिथिला सदा आभार रहेगा . 

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